नमस्कार दोस्तों! RojgarBytes में आपका स्वागत है। यदि आप UPSSSC Lower PCS और आगामी UPSSSC Exams की तैयारी कर रहे हैं, तो कंप्यूटर सेक्शन (computer section) में अच्छे अंक प्राप्त करना सफलता के लिए बेहद आवश्यक है। आपकी इसी तैयारी को और भी धारदार बनाने के लिए, हमने पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) के गहन विश्लेषण (thorough analysis) के आधार पर एक उच्च गुणवत्ता (high-quality) वाला कंप्यूटर प्रैक्टिस सेट 15 तैयार किया है।
यह सेट बिल्कुल वास्तविक परीक्षा के प्रश्न पत्र के माहौल को ध्यान में रखकर बनाया गया है। UPSSSC के नवीनतम पैटर्न के अनुसार, हर प्रश्न के लिए 5 विकल्प दिए गए हैं और यह पूरी तरह से द्विभाषी (bilingual) है। इस प्रैक्टिस सेट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विस्तृत व्याख्या (detailed explanations) है, जो आपके कॉन्सेप्ट्स को पूरी तरह से स्पष्ट कर देगी।
इस प्रैक्टिस सेट में निम्नलिखित टॉपिक्स पर आधारित कुल 15 महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल किए गए हैं
- मैलवेयर और वायरस (Malware & Viruses)
- एंटीवायरस और फायरवॉल (Antivirus and Firewall)
- साइबर हमले (Cyber Attacks)
- हैकर और पेनेट्रेशन टूल्स (Hacker and Penetration Tools)
- भविष्य के कौशल और साइबर सुरक्षा (Future Skills and Cybersecurity)
📌 महत्वपूर्ण सूचना एवं समय-सारणी (Important Notice & Schedule)
UPSSSC Lower PCS और आगामी परीक्षाओं के संपूर्ण Computer Syllabus को कवर करने के लिए हमने कुल 18 Practice Sets का एक विशेष प्लान तैयार किया है।
- शुरुआत और समापन (Schedule): यह प्रैक्टिस सेट सीरीज 3 अगस्त से शुरू हो चुकी है और 20 अगस्त तक नियमित रूप से चलेगी।
- लक्ष्य (Goal): चूंकि आपका UPSSSC Lower PCS का एग्जाम 23 अगस्त को होना तय है, इसलिए हम 20 अगस्त तक पूरा सिलेबस समाप्त कर देंगे। इससे आपको परीक्षा से ठीक पहले 2-3 दिन खुद से अंतिम रिवीजन करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा।
अपनी तैयारी को मजबूत करने के लिए प्रतिदिन इस 👉 सीरीज (series) से जरूर जुड़ें!
- सुप्त चरण (Dormant Phase) में वायरस निष्क्रिय रहता है और किसी विशिष्ट घटना (जैसे कोई निश्चित तिथि या सिस्टम क्रिया) द्वारा सक्रिय होने की प्रतीक्षा करता है।
- प्रसार चरण (Propagation Phase) में वायरस अपनी एकसमान प्रतिलिपियों (Identical copies) को अन्य प्रोग्रामों, फ़ाइलों या सिस्टम डिस्क में क्लोन करके फैलाता है।
- ट्रिगरिंग चरण (Triggering Phase) में वायरस उस वास्तविक हानिकारक पेलोड (जैसे डेटा डिलीट करना) को अंतिम रूप से निष्पादित करता है।
कथन I और II सही हैं, जबकि कथन III गलत है। कंप्यूटर वायरस का जीवन-चक्र सामान्यतः चार क्रमिक चरणों में विभाजित होता है:
- कथन III क्यों गलत है: ट्रिगरिंग चरण (Triggering Phase) में वायरस केवल उस पूर्व-निर्धारित स्थिति या घटना (Event) की पहचान करके 'सक्रिय' (Activate) होता है, जिसके आधार पर उसे पेलोड लॉन्च करना है। वास्तविक हानिकारक कार्य (जैसे फ़ाइलें मिटाना या सिस्टम लॉक करना) निष्पादन चरण (Execution Phase) में पूरा किया जाता है।
- कथन I और II क्यों सही हैं: सुप्त चरण में वायरस सिस्टम में बिना किसी गतिविधि के छिपा रहता है ताकि एंटीवायरस की पकड़ में न आए। प्रसार चरण में वायरस होस्ट फ़ाइलों से जुड़कर अपनी अनगिनत प्रतियाँ बनाता है।
कंप्यूटर वायरस के जीवन-चक्र के 4 प्रमुख चरण:
| चरण (Phase) | कार्यप्रणाली (Functionality) |
|---|---|
| 1. सुप्त चरण (Dormant Phase) | वायरस निष्क्रिय रहता है; यह चरण सभी वायरसों में अनिवार्य नहीं होता। |
| 2. प्रसार चरण (Propagation Phase) | वायरस अपनी प्रतिकृतियां बनाकर अन्य प्रोग्रामों व डिस्क क्षेत्रों में फैलता है। |
| 3. ट्रिगरिंग चरण (Triggering Phase) | किसी निश्चित घटना (उदा. शुक्रवार 13 तारीख) से पेलोड निष्पादन हेतु सक्रिय होना। |
| 4. निष्पादन चरण (Execution Phase) | वास्तविक पेलोड का निष्पादन (डैमेज या अनधिकृत क्रिया करना)। |
अभिकथन (A): आधुनिक एंटरप्राइज नेटवर्क सुरक्षा में 'ज़ीरो ट्रस्ट सिक्योरिटी मॉडल' (Zero Trust Security Model) कॉर्पोरेट नेटवर्क के आंतरिक पेरीमीटर के भीतर स्थित उपकरणों पर भी स्वतः भरोसा नहीं करता है।
कारण (R): ज़ीरो ट्रस्ट मॉडल का मूल सिद्धांत "कभी भरोसा न करें, हमेशा सत्यापित करें" (Never Trust, Always Verify) है, जिसके तहत नेटवर्क परिधि के अंदर और बाहर उत्पन्न होने वाले प्रत्येक एक्सेस अनुरोध का निरंतर प्रमाणीकरण अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में सही विकल्प का चयन कीजिए:||अभिकथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।|अभिकथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।|अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।|अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।|इनमें से कोई नहीं||D||
अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), अभिकथन (A) की सही और पूर्ण व्याख्या करता है।
व्याख्या: पारंपरिक नेटवर्क सुरक्षा 'कैसल-एंड-मोट' (Castle-and-Moat) मॉडल पर आधारित थी, जहाँ नेटवर्क परिधि (Firewall Boundary) के अंदर मौजूद सभी उपयोगकर्ताओं और उपकरणों को विश्वसनीय (Trusted) मान लिया जाता था। यदि कोई हैकर आंतरिक नेटवर्क में प्रवेश कर जाता था, तो वह पूरे सिस्टम में स्वतंत्र रूप से घूम सकता था (Lateral Movement)।
ज़ीरो ट्रस्ट की कार्यप्रणाली: ज़ीरो ट्रस्ट आर्किटेक्चर (NIST SP 800-207 मानक) यह मानता है कि नेटवर्क के भीतर पहले से ही खतरा मौजूद हो सकता है। इसलिए, चाहे कोई कर्मचारी कार्यालय के अंदर LAN से कनेक्ट हो या बाहर इंटरनेट से, प्रत्येक अनुरोध पर पहचान, डिवाइस स्वास्थ्य, संदर्भ और डेटा अनुमतियों की निरंतर जांच की जाती है।
ज़ीरो ट्रस्ट सुरक्षा के तीन मुख्य स्तंभ:
- स्पष्ट सत्यापन (Verify Explicitly): सभी उपलब्ध डेटा बिंदुओं (पहचान, स्थान, डिवाइस) के आधार पर हमेशा प्रमाणित करना।
- न्यूनतम विशेषाधिकार का उपयोग (Use Least Privilege Access): उपयोगकर्ताओं को केवल उतने ही संसाधनों तक सीमित पहुँच देना जितनी उनके कार्य के लिए आवश्यक हो (JIT/JEA एक्सेस)।
- उल्लंघन की पूर्व-धारणा (Assume Breach): यह मानकर चलना कि सुरक्षा में सेंध लग चुकी है, जिससे माइक्रो-सेगमेंटेशन और एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन लागू किया जाता है।
सही उत्तर 'इनमें से कोई नहीं' है, क्योंकि स्वतंत्र रूप से स्व-प्रतिकृति (Self-replicating) बनाकर नेटवर्क पर फैलने वाले मैलवेयर को कंप्यूटर वर्म (Computer Worm) कहा जाता है, जो दिए गए विकल्पों 1, 2, 3 और 4 में उपस्थित नहीं है।
- विकल्प 1 गलत है: ट्रोजन हॉर्स (Trojan Horse) एक उपयोगी या वैध सॉफ़्टवेयर का छद्म रूप धारण करता है और यह स्वतः अपनी प्रतियां नहीं बनाता।
- विकल्प 2 गलत है: लॉजिक बम किसी प्रोग्राम में डाला गया दुर्भावनापूर्ण कोड होता है जो किसी विशिष्ट शर्त के पूरा होने पर सक्रिय होता है।
- विकल्प 3 गलत है: वायरस को फैलने के लिए किसी 'होस्ट फ़ाइल' (जैसे .exe या .docx) और मानवीय हस्तक्षेप (फ़ाइल खोलने) की आवश्यकता होती है।
- विकल्प 4 गलत है: स्पाइवेयर उपयोगकर्ता की जासूसी करने और गुप्त डेटा चुराने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।
वायरस, वर्म और ट्रोजन के बीच मुख्य अंतर:
| मैलवेयर का प्रकार | होस्ट फ़ाइल की आवश्यकता? | स्व-प्रतिकृति (Self-Replicating)? | प्रसार का माध्यम |
|---|---|---|---|
| वायरस (Virus) | हाँ (होस्ट प्रोग्राम आवश्यक) | हाँ (केवल होस्ट फ़ाइल के साथ) | संक्रमित फ़ाइल साझा करने पर |
| वर्म (Worm) | नहीं (स्टैंडअलोन प्रोग्राम) | हाँ (स्वतः स्वतंत्र रूप से) | नेटवर्क कमज़ोरियों (Ports/Vulnerabilities) द्वारा |
| ट्रोजन (Trojan) | नहीं (स्वयं वैध ऐप दिखता है) | नहीं | उपयोगकर्ता द्वारा धोखा खाकर इंस्टॉल करने पर |
अतिरिक्त परीक्षा तथ्य:
- इतिहास का पहला प्रसिद्ध कंप्यूटर वर्म 'मॉरिस वर्म' (Morris Worm - 1988) था, जिसे कॉर्नेल विश्वविद्यालय के रॉबर्ट तपन मॉरिस ने बनाया था।
| सूची-I | सूची-II |
|---|---|
| a. फ़िशिंग (Phishing) | I. दो संचार पक्षों के मध्य अनधिकृत रूप से डेटा पैकेट को इंटरसेप्ट और परिवर्तित करना |
| b. मैन-इन-द-मिडिल (MitM) | II. डेटाबेस की सुरक्षा कमियों का लाभ उठाकर दुर्भावनापूर्ण क्वेरी निष्पादित करना |
| c. एसक्यूएल इंजेक्शन (SQL Injection) | III. संवेदनशील क्रेडेंशियल चुराने के लिए वैध संस्था के रूप में भ्रामक ईमेल या वेबसाइट भेजना |
| d. रैनसमवेयर (Ransomware) | IV. उपयोगकर्ता की फ़ाइलों को एन्क्रिप्ट करके उन्हें डिक्रिप्ट करने के बदले फिरौती की मांग करना |
सही सुमेलन a-III, b-I, c-II, d-IV है।
- (a) फ़िशिंग (Phishing): यह एक सोशल इंजीनियरिंग हमला है जिसमें हमलावर बैंक या प्रतिष्ठित कंपनी बनकर भ्रामक ईमेल या फ़िशिंग लिंक भेजते हैं ताकि उपयोगकर्ता का पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर या ओटीपी चुराया जा सके।
- (b) मैन-इन-द-मिडिल (MitM): इस हमले में हैकर क्लाइंट और सर्वर के बीच के संचार माध्यम में गुप्त रूप से घुसपैठ करके दोनों पक्षों के बीच आदान-प्रदान हो रहे डेटा को पढ़ता या बदल देता है (उदा. असुरक्षित पब्लिक वाई-फ़ाई पर स्निफिंग)।
- (c) एसक्यूएल इंजेक्शन (SQL Injection): यह वेब एप्लिकेशन वल्नरेबिलिटी है जहाँ इनपुट फ़ील्ड (जैसे लॉगिन बॉक्स) में दुर्भावनापूर्ण SQL कोड डालकर बैकएंड डेटाबेस को बायपास या नष्ट किया जाता है।
- (d) रैनसमवेयर (Ransomware): यह दुर्भावनापूर्ण मैलवेयर है जो शिकार के पूरे सिस्टम या महत्वपूर्ण फाइलों को मजबूत क्रिप्टोग्राफी (जैसे AES-256) से लॉक कर देता है और डिक्रिप्शन की (Key) के बदले क्रिप्टोकरेंसी (बिटकॉइन) में फिरौती मांगता है (उदा. WannaCry, NotPetya)।
विकल्प 3 सही नहीं है (अतः यह सही उत्तर है), क्योंकि फ़ायरवॉल की अपनी तकनीकी सीमाएँ होती हैं।
- विकल्प 3 की त्रुटि: फ़ायरवॉल केवल नेटवर्क ट्रैफ़िक (इनकमिंग और आउटगोइंग पैकेट) का विश्लेषण करता है। यह भौतिक रूप से सिस्टम में लगाई गई संक्रमित पेन ड्राइव (USB), वैध ईमेल के जरिए होने वाले सोशल इंजीनियरिंग हमलों (Phishing), या आंतरिक अधिकृत उपयोगकर्ताओं द्वारा किए गए दुर्भावनापूर्ण कार्यों को रोकने में पूरी तरह असमर्थ होता है। इसके लिए एंटीवायरस, एंडपॉइंट प्रोटेक्शन और यूजर अवेयरनेस की आवश्यकता होती है।
- अन्य विकल्प क्यों सही हैं:
- विकल्प 1: नेटवर्क स्तर पर राउटर आधारित हार्डवेयर फ़ायरवॉल और ऑपरेटिंग सिस्टम में सॉफ़्टवेयर फ़ायरवॉल (जैसे Windows Defender Firewall) दोनों कार्य करते हैं।
- विकल्प 2: स्टेटलेस फ़ायरवॉल केवल हेडर सूचना (IP एड्रेस, पोर्ट) देखता है, जबकि स्टेटफुल फ़ायरवॉल (Stateful Firewall) पूरे सक्रिय कनेक्शन की स्थिति पर नज़र रखता है।
- विकल्प 4: NGFW एप्लिकेशन लेयर (लेयर 7) तक के डेटा का डीप इंस्पेक्शन करने में सक्षम होता है।
- 'सिग्नेचर-आधारित पहचान' (Signature-based Detection) केवल उन्हीं मैलवेयर का पता लगा सकती है जिनके विशिष्ट बाइनरी पैटर्न (डिजिटल हस्ताक्षर) एंटीवायरस के डेटाबेस में पहले से ज्ञात हैं।
- 'पॉलीमॉर्फिक वायरस' (Polymorphic Virus) प्रत्येक नए संक्रमण के साथ अपने कोड और डिक्रिप्शन रूटीन को बदल लेता है, जिससे पारंपरिक सिग्नेचर डिटेक्शन को चकमा दिया जा सके।
- 'ह्यूरिस्टिक विश्लेषण' (Heuristic Analysis) अज्ञात या नए (Zero-day) मैलवेयर की पहचान उनके कोड की संरचना और असामान्य व्यवहार की जांच करके करता है।
कथन I, II और III तीनों पूर्णतः सत्य हैं। आधुनिक एंटीवायरस प्रणालियाँ कई उन्नत स्तरों पर कार्य करती हैं।
- कथन I (सिग्नेचर डिटेक्शन): यह सबसे पारंपरिक विधि है जहाँ एंटीवायरस ज्ञात वायरस के बाइट्स अनुक्रम (Signature) की तुलना स्कैन की जा रही फाइलों से करता है। इसकी सीमा यह है कि यह बिल्कुल नए (Unknown) वायरस को नहीं पहचान सकता।
- कथन II (पॉलीमॉर्फिज्म): पॉलीमॉर्फिक वायरस में एक 'म्यूटेशन इंजन' (Mutation Engine) लगा होता है। जब भी यह किसी नई फाइल को संक्रमित करता है, तो यह अलग एन्क्रिप्शन की और अलग कोड रूटीन बनाता है, जिससे फाइल का हैश और सिग्नेचर बदल जाता है और पारंपरिक स्कैनर इसे नहीं पकड़ पाते।
- कथन III (ह्यूरिस्टिक एवं बिहेवियरल एनालिसिस): अज्ञात खतरों से निपटने के लिए एंटीवायरस ह्यूरिस्टिक नियमों और सैंडबॉक्सिंग (Sandboxing) का उपयोग करते हैं। यदि कोई अज्ञात प्रोग्राम चुपके से सिस्टम रजिस्ट्री बदलने, सिस्टम फाइलों को ओवरराइट करने या अप्रत्याशित पोर्ट खोलने का प्रयास करता है, तो यह तकनीक उसे मैलवेयर घोषित कर देती है।
सही उत्तर 'इनमें से कोई नहीं' है, क्योंकि वास्तविक ज़ीरो-डे वल्नेरेबिलिटी (Zero-Day Vulnerability) किसी सॉफ़्टवेयर, हार्डवेयर या फ़र्मवेयर में मौजूद वह अज्ञात सुरक्षा खामी होती है, जिसके बारे में हमलावर को पता चल चुका होता है, परंतु सॉफ़्टवेयर निर्माता (Vendor) ने अभी तक उसका कोई आधिकारिक सुरक्षा पैच (Patch/Fix) जारी नहीं किया होता है।
- विकल्प 1, 2, 3 और 4 क्यों गलत हैं: ये सभी विकल्प मनगढ़ंत और भ्रामक परिभाषाएँ प्रस्तुत करते हैं जिनका साइबर सुरक्षा मानकों से कोई संबंध नहीं है।
ज़ीरो-डे शब्दावली के तीन महत्वपूर्ण आयाम:
- ज़ीरो-डे वल्नेरेबिलिटी (Vulnerability): सिस्टम में मौजूद अनदेखी खामी।
- ज़ीरो-डे एक्सप्लॉइट (Exploit): हमलावरों द्वारा उस खामी का फायदा उठाकर सिस्टम में सेंध लगाने के लिए लिखा गया विशेष कोड।
- ज़ीरो-डे अटैक (Attack): जब हमलावर विक्रेता द्वारा सुरक्षा पैच जारी करने से पहले ही इस खामी का उपयोग करके वास्तविक हमला कर देते हैं (क्योंकि डेवलपर के पास खामी ठीक करने के लिए "0 दिन" का समय बचा था)।
- बॉटनेट मैलवेयर से संक्रमित इंटरनेट से जुड़े उपकरणों (जैसे कंप्यूटर, IoT डिवाइस) का एक समन्वित नेटवर्क होता है, जिन्हें 'ज़ॉम्बी' (Zombies) कहा जाता है।
- साइबर हमलावर 'कमांड एंड कंट्रोल' (C&C या C2) सर्वर के माध्यम से इन सभी ज़ॉम्बी उपकरणों को दूरस्थ रूप से एक साथ निर्देशित करता है।
- DDoS हमले का प्राथमिक उद्देश्य किसी लक्षित सर्वर में घुसपैठ करके संवेदनशील पासवर्ड और गोपनीय डेटा चुराना होता है।
कथन I और II सही हैं, जबकि कथन III गलत है।
- कथन III क्यों गलत है: DDoS (Distributed Denial of Service) हमले का प्राथमिक उद्देश्य डेटा चोरी (Confidentiality breach) नहीं, बल्कि सेवा की उपलब्धता को बाधित करना (Availability breach) होता है। इसमें हमलावर बॉटनेट की मदद से लक्षित सर्वर या नेटवर्क पर भारी मात्रा में फर्जी ट्रैफ़िक (Volumetric Traffic) भेजकर उसकी बैंडविड्थ और सिस्टम संसाधनों को पूरी तरह से थका देता है, जिससे वैध उपयोगकर्ताओं के लिए सेवा ठप हो जाती है।
- कथन I और II क्यों सही हैं: बॉटनेट का निर्माण ट्रोजन या वर्म के माध्यम से लाखों असुरक्षित IoT कैमरों, राउटरों और पीसी को हैक करके किया जाता है। हमलावर (Botmaster) एक केंद्रीय C2 सर्वर से एक ही समय में सभी 'ज़ॉम्बी' मशीनों को एक निश्चित आईपी एड्रेस पर हमला करने का आदेश देता है (जैसे Mirai Botnet)।
सीआईए त्रय (CIA Triad) पर साइबर हमलों का प्रभाव:
| सुरक्षा स्तंभ | मुख्य उद्देश्य | लक्षित करने वाले प्रमुख हमले |
|---|---|---|
| गोपनीयता (Confidentiality) | डेटा को गुप्त रखना | स्निफिंग, स्पाइवेयर, मैन-इन-द-मिडिल |
| अखंडता (Integrity) | डेटा में अनधिकृत बदलाव रोकना | एसक्यूएल इंजेक्शन, डेटा टैम्परिंग |
| उपलब्धता (Availability) | सेवाएँ अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध रखना | DoS हमला, DDoS हमला, रैनसमवेयर |
सही उत्तर प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग (Prompt Engineering) है।
- व्याख्या: प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में एक आधुनिक विषय है, जिसमें AI मॉडल (जैसे ChatGPT, Claude, Gemini) को दिए जाने वाले इनपुट प्रॉम्प्ट (निर्देशों) को इस तरह से तैयार किया जाता है कि मॉडल सबसे सटीक, संदर्भ-युक्त और उपयोगी परिणाम प्रस्तुत करे।
- साइबर सुरक्षा में उपयोग:
- खतरे का विश्लेषण: सुरक्षा विश्लेषक लॉग फ़ाइलों और मैलवेयर कोड के विश्लेषण को स्वचालित करने के लिए सटीक प्रॉम्प्ट तैयार करते हैं।
- सुरक्षा जोखिम (Prompt Injection): हैकर्स द्वारा AI सिस्टम को बायपास करने के लिए 'प्रॉम्प्ट इंजेक्शन' हमले किए जाते हैं, जिनसे बचाव के लिए प्रॉम्प्ट डिफेंस तकनीक आवश्यक है।
- अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
- डेटा नॉर्मलाइज़ेशन: डेटाबेस में डेटा के दोहराव को कम करने की तकनीक है।
- बाइनरी एनकोडिंग: डेटा को 0 और 1 के रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है।
- कंपाइलर डिज़ाइनिंग: उच्च-स्तरीय भाषा को मशीन कोड में बदलने वाले सॉफ़्टवेयर का निर्माण है।
| सूची-I | सूची-II |
|---|---|
| a. एनमैप (Nmap) | I. नेटवर्क पैकेट स्निफिंग एवं डीप प्रोटोकॉल विश्लेषण (Packet Analyzer) |
| b. वायरशार्क (Wireshark) | II. ज्ञात सुरक्षा कमियों का फायदा उठाने हेतु पेन-टेस्टिंग एक्सप्लॉइट ढाँचा (Exploitation Framework) |
| c. मेटास्प्लोइट (Metasploit) | III. नेटवर्क पर खुले पोर्ट्स और सक्रिय होस्ट्स की खोज (Port Scanner) |
| d. जॉन द रिपर (John the Ripper) | IV. पासवर्ड हैश क्रैकिंग एवं प्रमाणीकरण सुरक्षा परीक्षण (Password Cracker) |
सही सुमेलन a-III, b-I, c-II, d-IV है।
- (a) एनमैप (Nmap - Network Mapper): यह एक ओपन-सोर्स नेटवर्क स्कैनर टूल है जिसका उपयोग नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर और एथिकल हैकर्स नेटवर्क पर जुड़े सक्रिय डिवाइसों (Hosts), खुले पोर्ट्स (Open Ports) और चल रहे ऑपरेटिंग सिस्टम/सेवाओं का पता लगाने के लिए करते हैं।
- (b) वायरशार्क (Wireshark): यह दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेटवर्क पैकेट एनालाइज़र और स्निफ़र टूल है। यह ईथरनेट या वाई-फ़ाई पर बहने वाले डेटा पैकेटों को कैप्चर करके प्रोटोकॉल स्तर पर उनका सूक्ष्म विश्लेषण करता है।
- (c) मेटास्प्लोइट (Metasploit Framework): पेनिट्रेशन टेस्टिंग (Pen-testing) के लिए प्रयुक्त होने वाला एक शक्तिशाली ढाँचा है जो सिस्टम की कमज़ोरियों (Vulnerabilities) को सत्यापित करने के लिए एक्सप्लॉइट कोड निष्पादित करता है।
- (d) जॉन द रिपर (John the Ripper): यह एक तेज़ पासवर्ड सुरक्षा ऑडिटिंग और पासवर्ड रिकवरी/क्रैकिंग टूल है जो डिक्शनरी अटैक और ब्रूट-फ़ोर्स तकनीकों का उपयोग करके क्रिप्टोग्राफ़िक हैश को क्रैक करता है।
विकल्प 2 पूर्णतः सत्य है। 'रूटकिट' (Rootkit) शब्द "Root" (यूनिक्स/लिनक्स में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकार) और "Kit" (सॉफ्टवेयर टूल्स का सेट) से मिलकर बना है।
- व्याख्या: रूटकिट मैलवेयर का मुख्य उद्देश्य सिस्टम पर प्रशासनिक नियंत्रण प्राप्त करना और अपनी उपस्थिति को अदृश्य बनाए रखना होता है। यह ऑपरेटिंग सिस्टम के कोर (Kernel APIs / System Calls) में हेरफेर करता है।
- अदृश्यता तंत्र: जब कोई एंटीवायरस या यूजर 'टास्क मैनेजर' खोलता है, तो रूटकिट ऑपरेटिंग सिस्टम के रिस्पॉन्स को बीच में ही मॉडिफाई कर देता है, जिससे उसकी प्रोसेस, फाइल्स और नेटवर्क पोर्ट्स सूची में दिखाई ही नहीं देते।
मैलवेयर के स्तर और प्रभाव क्षेत्र की तुलना:
| मैलवेयर प्रकार | निष्पादन स्तर (Level) | प्राथमिक उद्देश्य | पहचान की जटिलता |
|---|---|---|---|
| एडवेयर (Adware) | यूजर स्पेस (User Space) | अवांछित विज्ञापन प्रदर्शित करना | सरल |
| स्पाइवेयर (Spyware) | यूजर स्पेस / बैकग्राउंड | कीस्ट्रोक व पासवर्ड रिकॉर्डिंग | मध्यम |
| रूटकिट (Rootkit) | कर्नेल स्तर (Kernel / Ring 0) / फर्मवेयर | सिस्टम पर गुप्त कब्जा व छिपाव | अत्यधिक कठिन |
| बूटकिट (Bootkit) | MBR / VBR / UEFI बूटलोडर | OS लोड होने से पहले ही सक्रिय होना | अत्यधिक कठिन |
विकल्प 2 सही और सटीक अंतर स्पष्ट करता है।
- स्पूफ़िंग (Spoofing): यह एक तकनीकी छल (Masquerade) है जहाँ हमलावर किसी नेटवर्क संचार में डेटा पैकेट के हेडर को इस प्रकार बदल देता है कि वह किसी विश्वसनीय स्रोत से आता हुआ प्रतीत हो।
- IP Spoofing: पैकेट में फर्जी सोर्स IP डालना।
- Email Spoofing: ईमेल के 'From' हेडर में किसी वैध बैंक या अधिकारी का पता दिखाना।
- MAC Spoofing: नेटवर्क कार्ड के भौतिक पते को बदलना।
- फ़िशिंग (Phishing): यह एक सोशल इंजीनियरिंग हमला है जो इंसानी व्यवहार (डर, लालच या तात्कालिकता) का फायदा उठाता है। इसमें नकली ईमेल, फर्जी वेब पेज (Fake Login Pages) बनाकर यूज़र से उसका यूजरनेम, पासवर्ड और बैंकिंग पिन टाइप करवाया जाता है। (अक्सर फ़िशिंग करने के लिए ईमेल स्पूफ़िंग का उपयोग एक तकनीक के रूप में किया जाता है)।
सही उत्तर 'इनमें से कोई नहीं' है, क्योंकि IBM पर्सनल कंप्यूटर (PC) के लिए निर्मित पहले बूट सेक्टर वायरस का नाम 'ब्रेन' (Brain / (c)Brain) था, जो दिए गए विकल्पों 1, 2, 3 और 4 में उपस्थित नहीं है।
- ब्रेन वायरस (Brain - 1986): इसे लाहौर (पाकिस्तान) के दो भाइयों—बासित फारूक अल्वी और अमजद फारूक अल्वी ने बनाया था। यह 360 KB फ्लॉपी डिस्क के बूट सेक्टर को संक्रमित करता था और खुद को छिपाने के लिए स्टेल्थ तकनीक (Stealth technique) का इस्तेमाल करता था।
- अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
- क्रीपर (Creeper - 1971): यह अर्पानेट (ARPANET) पर चलने वाला इतिहास का पहला प्रयोगात्मक वर्म था (बॉब थॉमस द्वारा निर्मित), न कि आईबीएम पीसी वायरस।
- मॉरिस (Morris - 1988): यह इंटरनेट पर फैलने वाला पहला प्रमुख वर्म था।
- स्टक्सनेट (Stuxnet - 2010): यह ईरान के परमाणु संयंत्रों (SCADA सिस्टम) को निशाना बनाने वाला अत्यधिक परिष्कृत साइबर हथियार था।
- मेलिसा (Melissa - 1999): यह माइक्रोसॉफ्ट वर्ड और आउटलुक के जरिए फैलने वाला मैक्रो वायरस था।
- 'हनीपॉट' एक जानबूझकर कमज़ोर बनाया गया डिकॉय (Decoy / नकली) सिस्टम होता है, जिसे हैकर्स को आकर्षित करने और उनके हमले के तरीकों का अध्ययन करने के लिए नेटवर्क में तैनात किया जाता है।
- 'घुसपैठ का पता लगाने वाली प्रणाली' (IDS) दुर्भावनापूर्ण ट्रैफ़िक का पता चलने पर उसे स्वचालित रूप से ब्लॉक कर देती है, जबकि 'IPS' केवल नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर को अलर्ट भेजती है।
- हनीपॉट वास्तविक उत्पादन डेटा (Production Data) को संगृहीत नहीं करता है, जिससे मुख्य कॉर्पोरेट नेटवर्क पर जोखिम कम हो जाता है।
कथन I और III सही हैं, जबकि कथन II गलत है।
- कथन II क्यों गलत है: IDS और IPS की परिभाषाओं को परस्पर बदल दिया गया है:
- IDS (Intrusion Detection System): यह केवल एक 'पैसिव' (Passive) मॉनिटरिंग टूल है जो संदिग्ध ट्रैफ़िक की पहचान करके केवल अलर्ट या लॉग जेनरेट करता है, यह ट्रैफ़िक को ब्लॉक नहीं करता।
- IPS (Intrusion Prevention System): यह एक 'सक्रिय' (Active / In-line) सुरक्षा उपकरण है जो दुर्भावनापूर्ण पैकेट का पता चलते ही उसे तुरंत ड्रॉप/ब्लॉक (Drop/Block) कर देता है।
- कथन I और III क्यों सही हैं: हनीपॉट एक चारा (Bait) प्रणाली है जो हमलावरों को वास्तविक सर्वर से दूर भटकाती है और सुरक्षा शोधकर्ताओं को नए मैलवेयर और शून्य-दिन हमलों के विश्लेषण का सुरक्षित वातावरण प्रदान करती है।
विकल्प 3 सही नहीं है (अतः यह सही उत्तर है), क्योंकि एक सुरक्षित क्रिप्टोग्राफिक हैश फ़ंक्शन में 'हिमस्खलन प्रभाव' (Avalanche Effect) पाया जाता है।
- हिमस्खलन प्रभाव (Avalanche Effect): यदि मूल इनपुट डेटा में एक भी कॉमा, स्पेस या सिंगल बिट (0 या 1) का बदलाव किया जाए, तो उत्पन्न होने वाला परिणामी हैश मान (Hash Digest) पूरी तरह से और अप्रत्याशित रूप से बदल जाता है।
- अन्य विकल्प क्यों सही हैं:
- विकल्प 1 (निश्चित आकार): SHA-256 फ़ंक्शन चाहे 1 बाइट का इनपुट ले या 100 GB की फ़ाइल, आउटपुट हमेशा ठीक 256 बिट्स (64 हेक्साडेसिमल वर्ण) का ही होगा।
- विकल्प 2 (One-way property / Pre-image resistance): H(x) = y में x से y निकालना आसान है, लेकिन y से x निकालना असंभव है।
- विकल्प 4 (Collision Resistance): ऐसा कोई जोड़ा (x1, x2) खोजना जहां H(x1) = H(x2) हो, संगणकीय रूप से असंभव होना चाहिए।
- In the Dormant Phase, the virus remains idle and waits to be activated by a specific event (such as a certain date or system action).
- In the Propagation Phase, the virus places identical copies of itself into other programs, files, or system disks.
- In the Triggering Phase, the virus finally executes the actual harmful payload (such as deleting data).
Assertion (A): In modern enterprise network security, the 'Zero Trust Security Model' does not inherently trust even devices located within the corporate network's internal perimeter.
Reason (R): The core principle of the Zero Trust model is "Never Trust, Always Verify", requiring continuous authentication of every access request originating inside and outside the network perimeter.
Select the correct option with reference to the statements above:||Assertion (A) is true, but Reason (R) is false.|Assertion (A) is false, but Reason (R) is true.|Both Assertion (A) and Reason (R) are true, but Reason (R) is not the correct explanation of Assertion (A).|Both Assertion (A) and Reason (R) are true and Reason (R) is the correct explanation of Assertion (A).|None of the above||D||||Hard Q3||What is a malicious program (malware) called that replicates itself and spreads across a network independently using network security vulnerabilities, without requiring a host file or human intervention?||Trojan Horse|Logic Bomb|Macro Virus|Spyware|None of the above||E||||Easy Q4||Match List-I (Type of Cyber Attack) with List-II (Attack Mechanism/Objective):
| List-I | List-II |
|---|---|
| a. Phishing | I. Intercepting and altering data packets between two communicating parties without authorization |
| b. Man-in-the-Middle (MitM) | II. Exploiting database vulnerabilities to execute malicious queries |
| c. SQL Injection | III. Sending deceptive emails or websites disguised as legitimate entities to steal sensitive credentials |
| d. Ransomware | IV. Encrypting a user's files and demanding ransom in exchange for decrypting them |
- 'Signature-based Detection' can only identify malware whose specific binary patterns (digital signatures) are already known in the antivirus database.
- A 'Polymorphic Virus' changes its code and decryption routine with each new infection to evade traditional signature detection.
- 'Heuristic Analysis' identifies unknown or new (Zero-day) malware by analyzing code structure and abnormal behavior.
- A botnet is a coordinated network of malware-infected Internet-connected devices (such as computers, IoT devices), referred to as 'Zombies'.
- A cyber attacker remotely commands all these zombie devices simultaneously through a 'Command and Control' (C&C or C2) server.
- The primary objective of a DDoS attack is to infiltrate a target server to steal sensitive passwords and confidential data.
| List-I | List-II |
|---|---|
| a. Nmap | I. Network packet sniffing and deep protocol analysis (Packet Analyzer) |
| b. Wireshark | II. Penetration testing exploit framework to leverage known vulnerabilities |
| c. Metasploit | III. Scanning open ports and discovering active hosts on a network (Port Scanner) |
| d. John the Ripper | IV. Password hash cracking and authentication security auditing (Password Cracker) |
- A 'Honeypot' is a deliberately vulnerable decoy system deployed in a network to attract hackers and study their attack methodologies.
- An 'Intrusion Detection System' (IDS) automatically blocks malicious traffic upon detection, whereas an 'IPS' only sends alerts to the network administrator.
- A honeypot does not store real production data, thereby minimizing risk to the main corporate network.
UPSSSC Lower PCS 2026
Computer Questions Practice Set (Topic Wise)
Practice Set - 15
Practice Completed
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Performance Report
निष्कर्ष (Conclusion)
हमें उम्मीद है कि UPSSSC Lower PCS के लिए तैयार किया गया यह कंप्यूटर प्रैक्टिस सेट (Computer Practice Set) आपकी परीक्षा की तैयारी (exam preparation) में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। प्रश्नों को हल करने के बाद, विस्तृत व्याख्या (detailed explanations) को पढ़ना न भूलें, क्योंकि असली कॉन्सेप्ट्स वहीं छिपे हैं। अपना स्कोर (score) और किसी भी प्रश्न से जुड़ा डाउट (doubt) नीचे कमेंट सेक्शन (comment section) में अथवा Telegram Group में जरूर शेयर करें।
Thanks for Reading! / पढ़ने के लिए धन्यवाद! 🙏
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